दिल छू लेने वाली प्रेम कहानी
सुंदरपुर पहाड़ों की गोद में बसा एक छोटा सा शांत शहर था। बड़े शहरों के शोर-शराबे से कोसों दूर यहाँ की हवा में एक अजीब सी शांति थी। सुंदरपुर का जीवन था सुबह ओस की बूंदों से भीगी घास, दोपहर में हल्की धूप और शाम को पहाड़ों के पीछे छिपा हुआ सूरज।
“ज्ञान-कोष” नामक एक पुरानी किताबों की दुकान इस कस्बे में थी। आरव दुकान का मालिक था। आरव गहरी, शांत आँखों वाले पच्चीस-छब्बीस साल का युवा था। वह किताबों और अपनी पुरानी डायरी में स्केचिंग (चित्रकारी) करने से बहुत प्यार करता था। उसकी दुकान सिर्फ एक दुकान नहीं थी; यह कस्बे के उन कुछ लोगों के लिए भी एक आराम का स्थान था, जो पढ़ने का शौक रखते थे। आरव बहुत कम बोलता था और अक्सर चित्रों या अपनी पसंदीदा किताबों से बातें करता था।
एक दिन सुंदरपुर की एक शांत दोपहर में, जब आरव अपनी दुकान में बैठा किताब पढ़ रहा था, दुकान की एक पुरानी लकड़ी की घंटी बजी। सामने एक लड़की खड़ी थी, उसने देखा। उसकी आँखें चमकीली हो गईं और उसके बाल हवा में उड़ रहे थे। मीरा थी।
मीरा, जो दिल्ली में रहती थी, कुछ हफ्तों के लिए अपने परिवार के साथ सुंदरपुर गई थी। उसने बड़े शहरों की व्यस्त जिंदगी से पहाड़ों का यह आनंद अधिक पसंद किया।
क्या ‘गुज़रे ज़माने के खत’ नामक कोई पुस्तक मुझे मिल सकती है?”मीरा ने मधुर स्वर में पूछा।
आरव ने एक पुरानी शेल्फ से धूल झाड़कर एक किताब निकाली और उसके सामने रख दी, बिना कुछ कहे। मीरा ने किताब से अधिक आरव के हाथ में रखी उस डायरी पर देखा, जिसमें एक अधूरा चित्र था—एक झील और एक अकेला पेड़ उसके किनारे।
मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा कि तुम बहुत अच्छे चित्रकार हो।
आरारव, जो अक्सर लड़कियों से बात करने से घबरा जाता था, बस हल्का सा मुस्कुराया। “आपका धन्यवाद,” उसने धीरे से कहा।
उस दिन मीरा किताब लेकर चली गई, लेकिन उसके मन में वह शांत लड़का और उसकी अधूरी प्रतिकृति घर कर गई।
अगले दिन फिर मीरा आई। अब उसे कोई पुस्तक नहीं चाहिए थी। टूरिस्ट गाइड में नहीं होने वाले सुंदरपुर की कुछ ‘अनजान’ जगहें मुझे दिखा सकते हैं?”उसने कहा।
आरव हैरान हो गया। यह पहले कभी नहीं हुआ था। वह कुछ देर सोचता रहा, फिर अज्ञात कारण से हाँ कह दिया।
यहीं से आरव और मीरा का वह यात्रा शुरू हुई, जो उनकी ज़िंदगी बदलने वाली थी।
मीरा को आरव ने उन स्थानों पर ले गया, जहां वह अक्सर अकेला जाता था। वह ‘चुपचाप बहती’ नदी, वह ‘उम्मीद की पहाड़ी’, जहाँ से पूरा कस्बा एक छोटी सी तस्वीर जैसा लगता था, और वह पुराना बरगद का पेड़, जिसके नीचे आरव बैठकर अपनी डायरियों में चित्र बनाता था।
मीरा ने आरव की चुप्पी को पढ़ना सीखा। वह जानती थी कि आरव सबसे अधिक बोलता है जब वह कुछ नहीं कहता। उसकी कला और सपनों के बारे में वह घंटों सुनती रहती। आरव ने बताया कि वह चित्रों को अपनी माँ की याद में बनाता है, जिन्होंने उसे यह कला सिखाई थी।
शहर की चकाचौंध में बड़ी हुई मीरा को आरव की सादगी भा गई। वह आरव की किताबों के पन्नों को सूंघते हुए, बारिश की बूंदों को देखते हुए मुस्कुराते हुए सब कुछ अच्छा महसूस करता था।
वे एक शाम ‘उम्मीद की पहाड़ी’ पर बैठे थे, जब सूरज ढल रहा था और आसमान में बैंगनी और नारंगी रंग बिखरे हुए थे।
मीरा ने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “तुम्हारी आँखें बहुत कुछ कहती हैं, आरव।” लेकिन आप सिर्फ अपनी कला दिखाते हैं, अपने आप को नहीं।”
उस दिन अधूरा हुआ स्केच आरव ने मीरा को अपनी डायरी में देखा। अब वह समाप्त हो गया था। झील के किनारे एक अकेले पेड़ के नीचे बैठी एक लड़की, लगभग मीरा की तरह।
“तुम्हारे आने से पहले यह तस्वीर अधूरी थी,” आरव ने धीरे से कहा।
मीरा की आँखें रोने लगीं। उसने आरव के हाथ पर धीरे-धीरे अपना हाथ रखा। दो दिलों ने एकांत में वो सब कह दिया, जो शायद शब्दों में नहीं कहा जा सकता था।
Heart touching love story in Hindi
प्यार कहाँ, कब और कैसे होगा, कोई नहीं जानता। सुंदरपुर की उन्हीं शांत वादियों में आरव और मीरा का प्रेम पनप रहा था। वे एक-दूसरे से बहुत अलग थे, लेकिन शायद यही अलगाव उन्हें एक-दूसरे के करीब ला रहा था।
दिन चले गए। मीरा की छुट्टियां समाप्त होने वाली थीं। दोनों अपने आप में इससे परेशान थे।
मीरा की माँ ने एक दिन, जब वह अपनी बेटी की इस ‘पहाड़ी लड़के’ से नज़दीकी करती थी, उसे टोका। मीरा, ये सब झूठ है। आपका विश्व दिल्ली में है, यहाँ नहीं। वह लड़का क्या करता है? न कोई भविष्य, न कोई महत्वपूर्ण कार्य। एक छोटी सी किताबों की दुकान ही है।”
मीरा ने बहुत कोशिश की, अपनी माँ को बताने के लिए, “माँ, आप आरव को नहीं जानतीं।” वह सच्चा है।”
“मीरा, सच्चाई से ज़िंदगी नहीं चलती,” उसकी माँ ने कठोरता से कहा। हम कल वापस जा रहे हैं। तैयार रहो।”
मीरा की आत्मा टूट गई। वह रोते हुए आरव से मिली। Arv दुकान बंद कर दिया। मीरा रोते हुए देखकर वह घबरा गया।
मीरा, क्या हुआ?”
मीरा ने सब कुछ उसे बताया। आरव चुपचाप खड़ा रहकर सब कुछ सुनता रहा। उसके चेहरे पर सिर्फ गहरा दुख था।
तुम कुछ कहोगे नहीं, आरव?मीरा ने पूछा।
Arvind ने अपनी जेब से एक छोटा सा चित्र निकाला। उसी झील का चित्र फिर से आरव और मीरा का हाथ थामे हुए था।
“मैं तुम्हें रोक नहीं सकता, मीरा,” आरव ने चिल्लाकर कहा। मैं आपकी दुनिया से बहुत अलग हूँ। तुम्हारी माँ शायद सही है।”
“नहीं, आर्व! आप ऐसा कैसे कहते हैं?मीरा रोई। हमारा प्यार इतना कमजोर है क्या?”
मीरा, प्यार कमज़ोर नहीं है। लेकिन मैं स्वार्थी नहीं हूँ। मैं नहीं चाहता कि तुम अपनी ज़िंदगी मेरे लिए दे दो।”
मीरा ने कुछ नहीं कहा। शायद वह उसे जाने दे रहा था क्योंकि वह जानती थी कि आरव उससे बेइंतहा प्यार करता था।
जाने से एक दिन पहले, वे आखिरी बार “उम्मीद की पहाड़ी” पर मिले। दोनों ने कुछ नहीं कहा। मीरा और आरव आज कोई शब्द नहीं थे।
मीरा ने रोते हुए कहा, “वादा करो, तुम मुझे खत लिखोगे।”
“हर दिन,” आरव ने उसका हाथ थाम लिया। और अपनी कला को कभी नहीं छोड़ने का वादा करो। एक दिन आप एक बहुत बड़ा कलाकार बन जाएगा।”
“मैं कोशिश करूँगा,” आरव ने स्पष्ट किया।
मीरा ने चाँद का एक छोटा सा लॉकेट अपनी चेन से निकाला। अपने पास रखें। इसे देखते ही मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
आरव ने लॉकेट और डायरी, जिसमें उसकी पहली अधूरी फोटो थी, मीरा को दे दी। इसे सुरक्षित रखना। यह हमारी संपत्ति है।”
मीरा अभी सुबह सुंदरपुर बस स्टैंड पर अपने परिवार के साथ खड़ी थी। दूर खड़ा आरव उसे देख रहा था। मीरा ने कांच से उसे देखा, आँसू बहते हुए। जब तक उसकी आँखें ओझल नहीं हो गईं, आरव ने हाथ हिलाया।
आरव अपनी दुकान पर वापस आ गया। लेकिन अब वह दुकान, पुस्तकें, कस्बा सब सूना लगता था। मीरा सुंदरपुर की घाटी ले गई थी।
..।
(समय का बीतना) पाँच वर्ष बाद)
पाँच वर्ष बीत गए।
मीरा दिल्ली में एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करती थी। उसने काम में इतना अधिक समय बिताया था कि उसे दूसरे कामों के लिए समय नहीं मिलता था। उसके परिवार ने उसे शादी करने के लिए बार-बार कहा, लेकिन वह हर बार टाल देती।
शुरूआती महीने में आरव से खत आते रहे। उसने लिखा कि उसने एक नया चित्र बनाया है, आज का मौसम कितना अच्छा है और उसे मीरा की कितनी याद आती है। मीरा भी प्रतिक्रिया लिखती थी।
लेकिन आरव से खत आने लगे।
मीरा ने कई पत्र लिखे, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उसने सुंदरपुर को फोन करने की कोशिश की, लेकिन ‘ज्ञान-कोष’ का नंबर हमेशा बंद आता था। मीरा ने सोचा कि आरव उसे भूल सकता था। शायद उसने अपनी ज़िंदगी में कुछ और करने का निर्णय लिया है। यह सोचकर उसका दिल टूट जाता, लेकिन वह आशावादी थी। आज भी वह अपने तकिये के नीचे आरव की दी हुई डायरी रखकर सोती थी।
उधर, सुंदरपुर में आरव का जीवन भी बदल गया था।
मीरा के जाने के बाद, आरव अपनी कला में पूरी तरह से खो गया। उसकी तन्हाई, दुख, प्यार सब उसके कैनवास पर उतरने लगे। उसकी कलाकृतियों में एक अजीब सी कशिश थी, जो देखने वाले के दिल को छू जाती थी।
उसने मीरा को निरंतर पत्र लिखते रहे। उसे पता नहीं था कि उसके पत्र मीरा को नहीं मिल रहे थे। (शायद मीरा के परिवार ने उस तक वह पत्र नहीं पहुंचाया होगा) मीरा ने भी सोचा कि आरव उसे भूल गया है जब उसका उत्तर बंद हो गया।
एक दिन, सुंदरपुर एक प्रसिद्ध कला समीक्षक (कला समीक्षक) से मिले। उन्हें आरव की दुकान में लगी एक कलाकृति दिखाई दी। उस चित्र से इतना प्रभावित हो गया कि उसने आरव पर एक बड़ा लेख लिखा।
देखते ही देखते, आरव की ‘दर्द भरी’ कला लोकप्रिय हो गई। अब उसकी “ज्ञान-कोष” दुकान एक छोटी सी कला गैलरी बन गई। उसकी चित्रकला को दूर-दूर से लोग देखने आते थे। अब आरव सुंदरपुर में सिर्फ एक दुकानदार नहीं था, बल्कि पहाड़ों का कलाकार था।
लेकिन इतनी सुंदरता के बावजूद, आरव की आँखें अभी भी सूनी थीं। आज भी वह मीरा का चाँद वाला लॉकेट गले में पहनता था।
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एक सुबह दिल्ली में मीरा अखबार पढ़ रही थी। उसने ‘कला’ सेक्शन में छपी एक रिपोर्ट देखा। दिल्ली में पहाड़ों के कलाकार ‘आरव’ की प्रदर्शनी।”
मीरा का दिल धड़कने लगा। “आरव”? क्या यह आरव है? वह आँखें वही थीं, हालांकि चित्र धुंधला था।
मीरा रुक नहीं पाई। उसने कार्यालय से छुट्टी लेकर सीधे कला गैलरी की ओर भाग लिया।
गैलरी बहुत बड़ी थी और दीवारों पर सुंदर चित्र लगे हुए थे। हर चित्र सुंदरपुर का था। वह नदी, वह पहाड़ी और वह बरगद का वृक्ष। और हर चित्र में एक लड़की थी, जिसकी आँखें मीरा की तरह थीं।
मीरा एक-एक चित्र को देखते हुए रोती जा रही थी और उसके आँसू बहते जा रहे थे।
आखिरकार, वह एक विशाल चित्र के सामने रुकी। “अधूरी तस्वीर” नामक चित्र को बनाया गया था।
यह वही पेड़ और झील था, जो उसने पहली बार आरव की डायरी में देखा था। लेकिन पेड़ के नीचे बैठी लड़की का चेहरा इस पेंटिंग में पूरा नहीं था। जैसे कलाकार ने इसे पूरा नहीं किया हो।
“यह चित्र पूरा क्यों नहीं है?मीरा ने आँसू पोंछते हुए पास खड़े व्यक्ति से पूछा।
उस आदमी की दाढ़ी बढ़ी हुई थी और आँखों पर चश्मा था।
Ravi ने Mira को देखा। दोनों को समय ने बदल दिया था, लेकिन आँखें नहीं बदली थीं।
मेरा?”आरव की आवाज़ कांप पड़ी।”
मीरा ने उसकी ओर देखा। वह उसका प्रिय था। वह भागते हुए उससे लिपट गई।
आप… आप यहाँ हैं?आरव को विश्वास नहीं हो रहा था।
आपने पत्र लिखना क्यों छोड़ दिया?मीरा ने रोते हुए कहा।
“मैं कभी नहीं रुकता,” आरव ने कहा। मैंने सोचा कि आप मुझे भूल गए हैं।”
Arvad, मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ? आज भी मैं आपकी दी हुई डायरी रखता हूँ।”
आरव ने गले से लॉकेट निकाला। और मैंने कभी इसे अपने आप से अलग नहीं किया।”
दोनों को लगता था कि उनके बीच कभी कुछ खत्म नहीं हुआ। यह सिर्फ समय का खेल था।
Arva, यह चित्र अपूर्ण क्यों है?मीरा ने एक बार फिर पूछा।
मीरा ने आरव का हाथ थामा और उसे चित्र के पास ले गया।
आरव ने कहा, “क्योंकि जिस दिन तुमने मुझसे वादा किया था कि मैं एक बड़ा कलाकार बनूँगा, उस दिन मैंने भी खुद से वादा किया था कि मैं एक बड़ा कलाकार बनूँगा।” यह तस्वीर उसी दिन पूरी होगी जब तुम वापस आओगे। तुम्हारे बिना मेरी ज़िंदगी की हर तस्वीर अधूरी है।”
आरव ने अपना पेंट ब्रश उठाया और रंग को अपने अधूरे चेहरे पर लगाया। मीरा की आँखें चमक उठीं।
अब चित्र पूरा हो गया था।
गैलरी में खड़े लोगों ने तालियाँ बजा दीं। उन्हें एक सच्ची प्रेम कहानी और एक कलाकार की कला भी देखने को मिली। आरव और मीरा ने एक-दूसरे को देखा और एक-दूसरे को देखकर मुस्कराए। आज फिर, उनकी चुपता ने वो सब कह दिया, जो शब्द कभी नहीं कह सकते थे।
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दिल्ली के शोर में आकर सुंदरपुर की शांत वादियों में शुरू हुई कहानी पूरी हो गई।